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April, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। प्रतीक्षा के स्वप्न-बीज ।।

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प्रतीक्षा में बोए हैं स्वप्न-बीज

उड़ते सेमल के फाहों को समेटा है मुट्ठी में विरोधी हवाओं के बीच ।
आँसू ने धोई है - मन की चौखट और प्राणवायु ने सुखाई है - आँखों की जमीन ।
अधरों ने शब्दों से बनाई है अल्पना और धड़कनों ने प्रतीक्षा की लय में गाए हैं - बिल्कुल नए गीत ।
प्रतीक्षा में होती है आगमन की आहटें पाँवों की परछाईं हथेलियों की गुहारती पुकार
आँखों के आले में
प्रिय के आने का उजाला समाने लगता है
और एक सूर्य-लोक दमक उठता है ।

प्रतीक्षा के सन्नाटे में
कौंधती है आगमन-अनुगूँज
शून्यता में तिर आती हैं
पिघली हुई तरल आत्मीयता की लहरें ।

समाने लगता है
अपने भीतर अमिट संसार
आँखों में ...साँसों में
पसीज आई हथेली में ।

आँखों की पृथ्वी पर
होती हैं भाव-ऋतुएँ
नक्षत्र से निखरते हैं
तुम्हारे नयन निष्पलक

चुपचाप परखती हैं आँखें
अलौकिक प्रभालोक
तुम्हारे प्रणय का
अक्षय आकांक्षा-वलय ।  

।। धर्म से बाहर ।।

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प्रेम को
पृथ्वी की प्रथम और अंतिम चाहत की तरह चाहा है ।
स्वार्थ के समय ने प्यार को बहुत मैला कर दिया है । अविश्वास ने तोड़ दिया है प्यार का साँचा जैसे - ईश्वर से बने धर्म से ईश्वर बाहर हो गया है जैसे - धर्म के भीतर से लोगों ने ईश्वर को उठा दिया है ।
अपने
मानस के धर्म में मैं फिर से रच रही हूँ 'ईश्वर' अपनी आस्था की ताकत से वैसे ही अपने मन के धर्म से तुम्हारे ह्रदय में रच रही हूँ प्यार ।
शर्तों, अनुबंधों और प्रतिबंधों से परे तुम मेरे मन और अस्तित्व की पहली और अंतिम चाहत हो ...। 
(नीदरलैंड में प्रत्येक वर्ष फूलों के उत्सव का आयोजन होता है । पुष्पिता अवस्थी नियमित रूप से  उस आयोजन में शामिल होती हैं । ऊपर की तस्वीर ऐसे ही एक मौके की है ।)

।। शब्दों से खींचती हूँ साँस ।।

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विदेश-प्रवास में
अँधियारे के मीठे उजालेपन में
चाँदनी, सितारों में जब चमक चुकी होती है ... चाँद सोता है जब तुम्हारे सपनों में अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती की सुनहरी रोशनी में कभी शब्द तपते हैं ताप में और कभी मैं शब्दों के साथ ।

अपने बाहर की ही नहीं
भीतर की भी साँस रोककर शब्दों से खींचती हूँ साँस मन की उमसती कसक को पसीजी हथेली में रखती हूँ शब्द नए गढ़कर लिखे जाने वाले हों जैसे ह्रदय की मंजूषा में ।
सूरज
हर सुबह छींटता है नई उत्सव-रश्मियाँ जैसे वे भी शब्द-बीज हों अगले भविष्यार्थ के लिए ...।

(ऊपर की तस्वीर में, पुष्पिता जी अपने घर के ड्राइंग रूम में
थोड़ा फुर्सत में हैं - और शायद इसीलिये प्रसन्न दिख रही हैं ।)

'काँच का बक्सा' का दूसरा संस्करण

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नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्धारा प्रकाशित पुष्पिता अवस्थी की पुस्तक 'काँच का बक्सा' का पहला संस्करण प्रकाशन-वर्ष के पहले ही वर्ष में बिक गया है और नेशनल बुक ट्रस्ट को एक वर्ष के भीतर ही इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा है । इस पुस्तक में पुष्पिता ने नीदरलैंड की लोककथाओं को रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है । 'काँच का बक्सा' का पंजाबी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है, जिसे नेशनल बुक ट्रस्ट ने ही प्रकाशित किया है और उनके अनुसार जिसे पंजाबी पाठकों के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली है । पुष्पिता के लिए नीदरलैंड में रह रहे कुछेक पंजाबी भाषी परिवारों के लोगों से यह सुनना/ जानना खासा सुखद और आश्चर्यपूर्ण रहा कि उनके बच्चों ने इसे पढ़ा और पसंद किया है । हिंदी में प्रकाशन के एक वर्ष के भीतर ही इसके दूसरे संस्करण के प्रकाशित होने की नेशनल बुक ट्रस्ट के पदाधिकारियों से मिली सूचना ने भी पुष्पिता को खुशी तो दी ही है, चकित भी किया है । उनका कहना है कि इस पुस्तक की सामग्री को लेकर वह उत्साहित तो थीं, और उन्होंने इसमें की कहानियों को बड़े रिसर्च और मनोयोग के साथ लिखा था - लेकिन उन्हें भी…

।। स्वप्न कैनवास ।।

मेरे पास
तुम्हारे शब्द हैं
और तुम्हारे पास मेरा मौन ।

तुम्हारे पास मेरे अधीर शब्द हैं मेरे पास तुम्हारा इच्छित संसार ।

स्वप्न-कैनवास में यथार्थ के चटख, शोख और सरस रंग जिन्हें देती हूँ शब्द-नाम अविस्मरणीय - तुम्हारी ही तरह ।

स्मृतियों में बसे रहते हैं अकेलेपन के विश्वसनीय सहचर कभी तुम्हारे शब्द कभी आत्मीय - आत्मज शब्द ।

सविता-रश्मियों की सुनहरी अंजलि में रखती हूँ स्नेह-चितवन के समर्पण का अक्षय चुम्बन ।

परदेशी हवाओं में
घुलाती हूँ प्रणयगंधी स्वप्न-श्वास और अपरिचित दुनिया को बनाती हूँ - आत्मीय

जैसे बच्चे बनाते हैं रेत में घरौंदा
जीवन-यथार्थ में जीते हैं - स्वप्न खेल । 

तुम्हारे भावाकाश में रोपती हूँ अपने आकांक्षा बीज सृजन की आहट अगोरती धड़कनें  रचना चाहती हैं - स्नेह तरंगित ध्वनियाँ ।

।। ईश्वरीय प्रेम ।।

शताब्दी की शुरुआत के
प्रथम अंश में
रख दिए हैं - अपने लाल ओंठ
प्रेम के शब्दों के लिए ।

प्रेम की आत्मीयता से
रचूँगी सजल-उर-प्राण सदृश
सरस और विश्वसनीय बोली
ह्रदय से हार्दिक संवाद के लिए धरती का आदमी जाने पृथ्वी की अपनी औरत से प्यार करना जो सृष्टि भी रचती है और पुरुष भी ।
मैंने शताब्दी के शुरू में चुना है - प्रेम
शताब्दी के संपूर्ण जीवन के लिए ।
प्रेम बचा सकता है - समय और समय में पूरी शताब्दी को ।
प्रेम जानता है
इतिहास की ठोकरों से
कैसे समय को
और समय को प्यार करने वाले
लोगों की छाती पर
लिखी हुई ऐतिहासिक इबारत को
बचाया जा सके ।

इस शताब्दी के लिए
प्रेम की भाषा की अभिव्यक्ति के लिए
एक लिपि रचेंगे
जैसे - स्पर्श की लिपि में
होती है - प्यार की भाषा
मिठास की अनकही अंतरंगता ।  

।। रूपांतरण ।।

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'ईश्वराशीष' का आवरण

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कैरेबिआई देशों के लंबे प्रवास के दौरान पुष्पिता द्धारा रची गईं कविताओं को राधाकृष्ण प्रकाशन द्धारा प्रकाशित 'ईश्वराशीष' में संग्रहित किया गया है । इस कविता संग्रह का आवरण यह है :





'पुष्पिता की कविताएँ' का आवरण

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रेमाधव प्रकाशन द्धारा प्रकाशित 'पुष्पिता की कविताएँ' का आवरण 


।। प्रेम की हथेली ।।

घड़ी में
जागता है समय
स्मृतियों का
प्रिय की साँसों में         उसकी साँसें अपनी आँखों में जोड़ लिए हैं उसने   प्रिय के नयन जी - जीवन जुड़ाने के लिए
प्रिय की सुगंध को         सहेज लायी है         सामानों में ... कि वे जीवित स्वप्न बन गये और प्रिय के पहचान की सुगंध         प्रणय अस्मिता के लिए कि अब उसके सामान और वह प्रिय की पहचान दे रहे हैं
प्रेम की हथेली की तरह

।। मौन ।।

प्रेम में
अपनी आँखों में
देखती है वह - प्रिय के नयन
और अनुभव करती है - सुख - गिरा अनयन, नयन बिनु बानी -
अपने ही अधरों में अनुभव करती है - प्रिय-प्रणय-स्वाद

अपने शब्दों की
व्यंजना में महसूस करती है -
प्रिय-प्रणय-अभिव्यंजना ...

अपनी स्पर्शाकांक्षा में
सुनती है - प्रिय के शब्द
और चुप हो जाती है
संप्रेषण के लिए - प्रिय को
प्रिय की तरह
मौन ही

पुष्पिता अवस्थी की कविताएँ उस भाव-संसार और उन भाव-दशाओं का ज्ञापन-उद्घाटन हैं जिनके बिना मनुष्य-चित्त के भीतरी सौंदर्य को परख पाना संभव नहीं है

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'शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएँ', 'अक्षत' और 'ईश्वराशीष' के बाद 'ह्रदय की हथेली' से पुष्पिता ने प्रणय, प्रतीक्षा, विरह, आतुरता, समर्पण और आराधना की लौकिक अनुभूतियों को लोकेषणा के सँकरे दायरे से बाहर निकाल कर जैसे एक आध्यात्मिक सिहरन में बदल दिया है । 'आँसू दुनिया के लिए आँख का पानी है/ लेकिन तुम्हारे लिए दुःख की आग है' कहते हुए कवयित्री ने प्रबंधन-पटु समय में प्रेम की एक सरल रेखा खींचनी चाही है । उसके यहाँ 'प्रेम के रूपक' नहीं हैं, प्रणय का पिघलता ताप है, आँखों की चौखट में विश्वास की अल्पना है, अन-जी आकांक्षाओं की प्यास है, प्रेम का धन-धान्य है, स्मृति के कुठले में सँजोए अन्न की तरह अतीत का वैभव है । अचरज नहीं कि कवयित्री खुद यह कहती है - 'इन कविताओं की व्यंजना आकाश की तरह निस्सीम है और आकाश गंगा की तरह अछोर भी । इनके अंदर की यात्रा मन के रंगों-रचावों की यात्रा है, रस-कलश की छलकन है । सृजन के राग का आरोहण और कृत्रिमता के तिमिर का तिरोहण है ।' प्रेम के उद्दाम आदिम संगीत से होती - प्रेम का गान करने और उसका मान रखने वाले कविय…

सजल उर मित्र

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अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता के अपने लोकप्रिय स्तंभ  'कभी-कभार' में लिखा :

अपना यह रुझान किसी कदर छिपाया नहीं जाता कि इस समय हिंदी में जिस अखबारी और अंतर्ध्वनिहीन भाषा में ज्यादातर कविता लिखी जा रही है और कविता से जातीय स्मृति के गायब या कम से कम निष्क्रिय होने की स्थिति बनी हुई है, अगर कोई कुछ पुरानी उक्तियों - बिंबों या शब्दसंपदा को फिर से कविता की काया में लाने की कोशिश करता है तो उस पर ध्यान देने का मन होता है । बरसों पहले बनारस में पुष्पिता से भेंट हुई थी : जो कृष्णमूर्ति से प्रभावित और विद्यानिवास मिश्र के निकट थीं । फिर वे सूरीनाम चली गईं और इन दिनों हालैंड में हैं । वहां से वे पत्रिका निकालने और एक सांस्कृतिक केंद्र स्थापित करने का उद्यम कर रही हैं; इस सिलसिले में वे फ्रेंकफर्ट मिलने भी आईं थीं । इस बीच राधाकृष्ण प्रकाशन द्धारा प्रकाशित उनके प्रेम कविता संग्रह को देखने का अवसर मिला । लगा कि इन कविताओं को अलक्षित नहीं जाना चाहिए । एक अंश है :

मैं जानती हूँ तुम्हें जैसे धरती जानती है जल पीना और जल जानता है धरती में समाना मैं जानती हूँ तुम्हें जैसे फूल जानता है…

।। राग में शब्द ।।

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प्रेम में
साँस की लय में रचे हुए शब्द
घुल जाते हैं - अपनी लय में जैसे - राग में शब्द         शब्द में राग ।

प्रेम की
सार्वभौमिक गूँज - अनुगूँज में
विस्मृत हो जाता है - स्व और सर्वस्व
शेष रहता है - प्रेम                  और ...सिर्फ - प्रेम प्रेम प्रेम जैसे      समुद्र में समुद्र      धरती में धरती      सूरज में सूरज      चाँद में चाँद      और तृषा में तृप्ति      प्यास में जल      जीवन में - जीवन की तरह