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July, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। नभ-संवाद ।।

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आकाश बन जाता है शब्द बादल बरसता है जब हम सुनते हैं आकाश के शब्द ।
बूँदें गोदती हैं गोदना वसुधा की गदराई देह पर ।
मैना युगल धोते हैं सूर्याग्नि से अपने पंख और पीते हैं चोंच खोल मेघ जल
नेवला धरती की कोख से बाहर काढ़कर आँखें देखता है सिर्फ बरसात और सुनता है मेघ-शोर ।
बरसात रुकने के साथ चुप हो जाता है आकाश ।
चिड़ियाँ बादलों के टुकड़ों को स्कार्फ-सा बाँध खेलती हैं जंगल के क्षितिज पर
बादल के टुकड़े निचोड़े गए कपड़ों की तरह हवा की अरगनी में टंग जाते हैं जिन्हें फिर से सुखाने आ जाता है सूरज ।
अगली तारीखों की तरह जिनसे बचा नहीं पाती है कोरी मृत्यु भी ।

।। स्त्री का इंद्रधनुष ।।

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घास काटते हुए अक्सर सोचती है वह अगर समय को भी वह घास की तरह काट कर सहेज सकती तो वर्षों का समय सँभाल रखती अपने पास
तब लिखती वह समय की वास्तविक सच्चाई जिसे देखते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं लोग जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
वह
सब सच पुख्ता ढंग से बयान करना चाहती है समय के अमिट शिलालेख पर जहाँ किसी के हाथ नहीं पहुँच पाते हैं ध्वस्त करने के लिए
वह
अपने श्रम को फसल में बदल देना चाहती है भूखों की भूख के विरुद्ध
आतंक और युद्ध विस्फोटों की आग और धुएँ के कारण बंद कर दिया है इंद्रधनुष ने आकाश में दिखना
वह
समय को नए रंग-संयोजन में गढ़ देना चाहती है धरती पर जो चले आ रहे आकाशी इंद्रधनुष की धारणा से है विलुप्त काल्पनिक देव इंद्र का नहीं स्त्री द्धारा रचित धरती पर
अपने समय के लिए
समय का पक्ष

।। कथा ।।

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देखते देखते सूख गया पेड़ और बस देखते देखते कट गया पेड़ कई टुकड़ों में जैसे चिता में जल जाती है                मानव देह                देखते देखते
वृक्षों के नीचे की सूख गई धरती जड़ों को नहीं मिला धरती का दूध हवा धूप और बरसात के बावजूद वृक्ष नहीं जी सकता धरती के बिना
वृक्ष धरती का संरक्षक था जैसे
सूनी हो गई है धरती पेड़ के बिना उठ गया है जैसे पर्यावरण का पहरुआ घर के बाहर सदा बैठा घर का वयोवृद्ध सदस्य बिना पूछे अचानक जैसे छोड़ गया हमें
वह देखता था हमें आशीषता था हम सबको कंधों पर कबूतर करते थे कलरव उसकी बाँहों में लटकती थीं बर्फ की कतरनें उसकी देह को भिगोती थी बरसात ठंडी हवाओं को अपनी छाती पर रोककर बचाता था वह हमें और हमारा घर उसकी छाया जीती थी हमारी आँखें हम अकेले हो गए हैं जैसे हमारे भीतर से कुछ उठ गया हो
कटे वृक्ष की जगह आकाश ने भर दी है सूर्य किरणों ने वहाँ
अपनी रेखाएँ खींच दी हैं धूप ने अपना ताप भर दिया है वहाँ
फिर भी एक पेड़ ने हमें छोड़ कर न भरने वाली जगह खाली कर दी है जो एक पेड़ ही कर सकेगा पूरी कई वर्षों बाद ।

डच के सामाजिक-राजनीतिक और साँस्कृतिक इतिहास की पड़ताल करती डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की पुस्तक

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आधारशिला प्रकाशन द्धारा प्रकाशित डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की पुस्तक 'नीदरलैंड बनाम हॉलैंड जीवन संस्कृति' पिछले दिनों भारत में सूरीनाम दूतावास के प्रमुख अलिबक्स तथा डच राजदूत स्टोलिंगा को भेंट की गई । इससे पूर्व, नीदरलैंड के प्रमुख शहर द हेग के महात्मा गाँधी केंद्र में आयोजित हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन में यह पुस्तक नीदरलैंड में भारतीय राजदूत राजेश नंदन प्रसाद को भेंट की गई थी । राजेश नंदन प्रसाद उक्त सम्मलेन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे । डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की इस पुस्तक में डच के सामाजिक-राजनीतिक और साँस्कृतिक इतिहास की व्यापक पड़ताल की गई है तथा डच नागरिकों के धर्म और संस्कृति साथ जुड़ाव का जायेजा लिया गया है । डच नागरिकों की समाज व्यवस्था, उनकी शिक्षा व्यवस्था, उनके साहित्य, उनके सिनेमा, उनकी कला और उनके खानपान को लेकर इस पुस्तक में जो पड़ताल की गई है - उसके चलते यह पुस्तक खास महत्व की हो गई है । सूरीनाम में बोली जाने वाली सरनामी भाषा का हिंदी भाषा के साथ जो संबंध है, उसे भी व्यापक स्वरूप में पहचानने की कोशिश इस पुस्तक में है ।

चार छोटी कविताएँ

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।। सर्वांग ।। 

मैं तुम्हारी आत्मा का वाक्य हूँ अंतःकरण की भाषा का सर्वांग
तुम्हारे शब्दों ने रची है प्यार की देह              मेरे भीतर जो बोलती है              तुम्हारी ही तरह              मुझे एकांत में करके
।। झुककर ।।
नदी में अपनी छवि देखी
आवाज से तुम्हारी धड़कनों में उतरकर जैसे छवि देखती हूँ अपनी अक्सर
वृक्ष याकि वक्ष के कोटर में कुछ अंकुरित शब्द रखे वे चहकने लगे नवजात पाखी की तरह
नवोदित द्धीप पर कुछ शब्द फैलाती हूँ और कभी बटोर लेती हूँ प्रतीक्षा में तुम्हारी
।। सुंदरतम रहस्य ।।
खुद को छोड़ दिया है मुझमें जैसे शब्दों में छूट जाता है इतिहास
सपनों की कोमलता आकार लेने लगी है सच्चाई में अनुराग का रंग
उतरने लगता है देह में पलकों में लरजने लगते हैं ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य
आँखें ओंठों की तरह मुस्कुराने लगती हैं सिर्फ तुम्हें सोचने भर से
।। अंतस में ।।
सूर्य से सोख लिए हैं रोशनी के रजकण
अधूरे चाँद के निकट रख दी हैं तुम्हारी स्मृतियाँ
स्वाती बूँद से पी है तुम्हारी निर्मल नमी बसंत बीज को उगाया है अंतस में
कहीं से मन झरोखे को थामे हुए तुम रहते हो मे…

नीदरलैंड में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन

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नीदरलैंड में डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की देख-रेख में काम कर रही संस्था हिंदी यूनीवर्स फाउंडेशन ने भारत में डॉक्टर दिवाकर भट्ट द्धारा संस्थापित संस्था 'आधारशिला' के साथ मिलकर नीदरलैंड में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन का आयोजन किया । नीदरलैंड के प्रमुख शहर द हेग में महात्मा गाँधी केंद्र में आयोजित हुए इस सम्मेलन में भारतीय राजदूत राजेश नंदन प्रसाद मुख्य अतिथि थे तथा द हेग के उपमहापौर रॉबिन बलदेव सिंह ने सम्मेलन की अध्यक्षता की । 'विश्व में हिंदी भाषा परिवार का अस्तित्व और अस्मिता' सत्र की अध्यक्षता भारत सरकार के प्रवासी भारतीय सम्मान तथा नीदरलैंड के 'डच नाइट हुड' सम्मान से सम्मानित राम लखीना ने की । डॉक्टर दिवाकर भट्ट ने इस सत्र का संचालन किया । डॉक्टर मृदुला जोशी, डॉक्टर बीएस नेगी, डॉक्टर सुनील कुमार जोशी, डॉक्टर कृष्ण कुमार, डॉक्टर महेंद्र अग्रवाल, सुनील शाह आदि ने चर्चा में भाग लिया । सम्मेलन के दूसरे सत्र की अध्यक्षता यूरोप की प्रवासी भारतीय संस्था एफसीसीआई के अध्यक्ष डॉक्टर जसबीर सिंह ने की । नीदरलैंड में हिंदी शिक्षिका और 'संवाद' की निर्…

।। चाँद का आत्म-सुख ।।

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सुनीलाकाश वक्ष पर लटकती हुई घड़ी है चाँद मिनट-दर-मिनट अंतरिक्ष से समेटता-बटोरता समय उलीचता है धरती पर और बदलता है तारीखें
दिन-दिवस-माह लिखा जाता है जिसमें जन्म और मृत्यु का हिसाब सत्ता और शासन का इतिहास गुलामी का दर्द दवा बन जाने के लिए
चाँद करता है खामोश बगावत चाँदनी बनकर पहुँचता है जंगल-दर-जंगल दासता से निचुड़े हुए लोग बुश नीग्रो अमर इंडियन ब्रिटिश इंडियन खून को पसीना की तरह बहाए हुए लोग छिपे हैं दक्षिण अमेरिका के सूरीनाम, गयाना और ब्राजीली जंगलों में जंगल-जीवी नागरीय संस्कृति के अनागरिक सुसंस्कृत सभ्यता से डरती हैं प्रकृतिजीवी वनीली जातियाँ
चाँद जंगली जातियों का उत्सवी राजा है पूर्णिमा की रात चाँद के राजस्व में जंगली जातियाँ जीती हैं आनन्दोत्सव बेधड़क जिनका इतिहास लिखता है चाँद पृथ्वी की तथाकथित आधुनिक मानवीय सभ्यताओं के नाम
चाँद पारिजाती कल्पवृक्ष रूपाभी रश्मियाँ
चन्द्र कुसुम नवप्रियाओं के केशों में पुष्प-गजरा
धरती के सौंदर्य के माथे की बिंदी है चाँद जिसे चूमती हैं आँखें सारी रात सपनों से भरकर