गुरुवार, 28 सितंबर 2017

।। नेह-छाल ।।























अपनी साँसों के स्कॉर्फ में
सहेजती हूँ     सुनहरे बसंत की
पीली खुशबू
तुम्हारी साँसों की रेत पर
'सनी डे' रचाने के लिए
स्वर्णिम इबारत

'समय'
पतझर की तरह
उतरता है मेरी धड़कनों में
गहरे जंगल में
अँधेरे की तरह
फँसा है      मेरा समय
समय की शाखों में
हवाओं की तरह
उलझकर झटपटाती है मेरी साँस

घने जंगल में
कुहरे के रंग में
अटकी हैं उम्मीदें
रात की स्याही से
अपनी उँगलियाँ गीली कर
धरती पर
उतरे हुए
सूरज की देह पर
लिखती हूँ    तुम्हारा नाम

अपने समय के
तने की
छाल को छील कर
उस पर
तुम्हारी सहलाई हुई उँगलियों से भीगे
अपने नाखूनों से कुरेद कर
लिखा है तुम्हारा नाम
जिसे मेरी आँखें पढ़ती हैं

साँसें चूमकर
रचती हैं प्यार की नई
अनश्वर भाषा
हवाओं में सींजने के लिए
जिससे
पूरे विश्व के मानव की
साँसों की भाषा बदल सके
सिर्फ तुम्हारे नाम पर ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

बुधवार, 27 सितंबर 2017

।। आत्मीय उपासना ।।























आँसू लिखित शब्दों में
होता है    ईश्वर
ईश्वर के कंधों पर
टिकाती हूँ अपनी आँखें
और भूल जाती हूँ     आँसू
जो तुम्हारी
अनुपस्थिति की आँख से
उतरा है
मन-गंगोत्री की व्यथा में

तुमसे कहने की सारी बातें
वियोग में घुल कर
आँसू बन जाती हैं
अपनी साधना में
प्रसाद के रूप में
मैं भगवान से तुम्हें
और तुम्हारी खुशी माँगती हूँ

तुम
मेरी आँख की आँख हो
मैं तुम्हारी ही आँखों को
अपनी दृष्टि बनाकर
दुनिया देखती हूँ

ओठों ने
तुम्हारा नाम पुकार कर
अपनी धरती में
तुम्हारे ओठों को
घर बनाने की अनुमति दी है
हथेली ने
तुम्हारी हथेली को
अपनी संपूर्ण पृथ्वी सौंप दी है

स्मृति में
तुम्हारा रूप बसाकर
ईश्वर की तरह
पूजा की है

रागिनी में
राग की तृषा पर
तुम्हारे अनुराग की
शक्ति दी है

अपनी देह की पृथ्वी
मैंने तुम्हारे
और तुम्हारी संतान के
नाम कर दी है
जहाँ वे तुम्हारा नाम लिखें
सिर्फ मेरे सुख के लिए

तुम्हारे लिए
भगीरथ की तरह
अपने भीतर
भागीरथ की तलाश की है

तुम तक
पहुँच कर
अपने प्रणय-गर्भ में
तुम्हारे बीज से
एक ईश्वर की रचना की है
अर्धनारीश्वर की संतान ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

।। अक्षय-स्रोत ।।
















शब्द
तुम्हारी तरह
देखते हैं    मुझे
और मैं
शब्दों को तुम्हारी तरह

ईश्वर के प्रेम की
छाया है     तुम्हारी आत्मा पर
ईश्वर अंश है
तुम्हारा चित्त

तुम्हारे प्रेम में
मैं 'प्रेम' का ईश्वर देखती हूँ

तुम्हें छूकर
मैं प्रेम का ईश्वर छूती हूँ

तुम्हारे कारण
पाषाण में बचा है   ईश्वर

शब्दों में
तुमने रचा है     ईश्वर
क्योंकि
तुमने ही
तुम्हारे अस्तित्व में रचा है ईश्वर

इसीलिए तुममें है
ईश्वर का प्रेम
ईश्वरीय प्रेम
पवित्र पारदर्शी
प्रणय नदी का उद् गम
अक्षय स्रोत ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

शनिवार, 23 सितंबर 2017

।। शब्दों से खींचती हूँ साँस ।।
















विदेश के प्रवास में
अँधियारे के मीठे उजालेपन में
चाँदनी, सितारों में
जब चमक चुकी होती है
चाँद सोता है
जब तुम्हारे सपनों में
अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती की
सुनहरी रोशनी में
कभी शब्द तपते हैं ताप में
और कभी मैं शब्दों के साथ

अपने बाहर की ही नहीं
भीतर की भी साँस रोककर शब्दों से खींचती हूँ साँस
पसीने से तर-ब-तर
मन की उमसती कसक को
पसीजी हथेली में रखती हूँ
शब्द बनाकर
तुम्हारे लिए लिखे जानेवाले
शब्द हों वे जैसे
हृदय-मंजूषा में
प्रेम की पीड़ा के बहुत एकांत में
चुपचाप जन्म लेते हैं शब्द
जैसे आधी रात को पहर बदलता है
हवाओं की साँस ठहर जाती है क्षण भर को
तब सितारे लिखते हैं      नई तारीख
नया दिवस

सूरज
हर सुबह
छींटता है नई उत्सव रश्मियाँ
जैसे वे भी
शब्द-बीज हों
अगले भविष्य के लिए ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

।। आकाशगंगा ।।
















तुम्हारे बिना
समय     नदी की तरह
बहता है मुझमें
मैं नहाती हूँ     डर की नदी में
जहाँ डसता है
अकेलेपन का पनीला     साँप
कई बार

मन-माटी को बनाती हूँ     पथरीला
जिसकी देह को
अपने स्पर्श से तराशकर
तुमने बनाया है    मोहक

सुख की तारीखों को
दफन करता है    समय
मन के कब्रिस्तान में
कपोत-सी
उड़ जाती हैं - साँसें
तुम्हारे वक्ष में धड़कने के लिए
तुम्हारी स्मृतियों की परछाईं में
पकड़ती हूँ तुम्हें

अपने भीतर के मौन में
जीती हूँ   तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम
तुम्हारी चुप्पी में होता है
तुम्हारा सलीकेदार अपनापन

अकेले के अंधेरेपन में
तुम्हारा नाम     भगवान्
ब्रह्मांड का एक अंग
देह की आकाशगंगा में
तैरकर आँखें
पार उतर जाना चाहती हैं
अपने ठहरे हुए समय के शिखर से
पटकर
तुम्हारी धड़कनों के साथ
चलना चाहती हैं     मेरी साँसें

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

बुधवार, 20 सितंबर 2017

।। महामंत्रोच्चार ।।
















प्रतिदिन
सूर्योदय के साथ
आदित्यस्त्रोत के महामंत्रोच्चार के बाद
सूर्य से
नमित-नयन प्रार्थना की
दमकते प्रणय की
जो प्राण शक्ति बने
और आत्मा को दीप्तमान् करे
अपने प्रकाश-लेप से

अपनी हर धड़कन में
वर्तमान की सुबह में
चीखी हूँ
पक्षियों की चहचहाहट में
प्रेम से अधिक
अपने प्रिय की पुकार में

मेरी आत्मा
प्रिय सहचर की खोज में
हर साँस में
रही है
एकाकी यायावर
 
उसका
आत्मीय
अकेलेपन में
पहचान ले उसे
और बगैर उसके कहे
उसके हृदय की भाषा को सुन
मौन निमंत्रण में
बन जाए
उसका
उसकी देह से भी अधिक
आत्मीय सहचर ।
 
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

।। तरंग ।।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
जिंदगी
शैंपेन की एक बूँद
लेकिन,
तुम्हारे होने पर
 
अकेले में 'वह'
जहर की एक बूँद है
मौत के डर से भरी
 
जिंदा देह में
जिंदगी की मौत
अपने भीतर
एक 'मसान' तट
को जन्म देना है ।

मेरी ऑंखें
मछली की आँखों की तरह प्रूप-समुद्र
तैरती तुम्हारी आँखों के नॉर्थ-सी में
जहाँ से सूर्यास्ती-सिंदूर को
अपनी आँखों की चुटकी में लेकर
मेरे भाल पर
भरा था तुमने
 
संध्या के
सूर्यास्ती अग्नि-कुंड की
परिक्रमा की थी
मेरी हथेली ने
तुम्हारी हथेली की
भावी भाग्य रेखा में
पहनाई थी   सूर्य रश्मियों से
लहरों में बनी तरंगित वरमाला
 
नॉर्थ-सी को
अपनी अँजुली में लेकर
तुम्हारी साँसों ने
कसम खाई थी
आजन्म-समुद्र की तरह
अपने प्यार से भर देने की
 
तुम
नॉर्थ-सी हो
और मैं तुम्हारे भीतर
समाई
तुम्हारे मन की
सामुद्री मछली
जिसकी आँखों और मन की
मौन की भाषा
पहचानते हो तुम ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

सोमवार, 18 सितंबर 2017

।। अवगाहन के लिए ।।























मैं सेमल के फूल-सी
अनुभूति की मुट्ठी में
समेट लेना चाहती हूँ
प्रणय का संपूर्ण सुख
तुम्हारी हथेली थामकर

बेपनाह
सूनी आँखों को
रखना चाहती हूँ
विश्वास के सुकोमल घर में

मैं
प्रकृति का अनन्य सुख
जानने के लिए
तुम्हारे सम्मुख होती हूँ समर्पित
देह से नहीं
देह से रिसकर
एक अनंत राग के
अवगाहन के लिए

अपने भीतर के
पराएपन से मुक्ति के लिए
मैं तुम्हारे अपनेपन में
समा जाना चाहती हूँ
और समाती हूँ चुपचाप
कभी तुम्हारे विश्वास की प्रणय घाटी में
कभी तुम्हारे आत्मीय अधर के अमृतकुंड में

मेरे ही प्राण
तुम्हारे प्राण बनकर
धड़कते हैं अब
मेरे वक्ष भीतर

तुम्हारी छवि
छूती है मेरी मन-छाया
तुम्हारी बेचैन साँसों की कसक
रिस आती है प्रणय की रश्मि बनकर

स्वतंत्र साँस से
आती है    बाँसुरी की धुन
जो कृष्ण ने बजाई थी
आत्मा के प्रणय-नाद के
निनाद के लिए

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

सोमवार, 11 सितंबर 2017

सूरीनाम में रहने वाले प्रवासियों की संघर्ष की गाथा है 'छिन्नमूल'


प्रवासी भारतीय लेखकों में पुष्पिता अवस्थी का नाम प्रतिष्‍ठा से लिया जाता है । पहली बार किसी प्रवासी भारतीय लेखिका ने सूरीनाम और कैरेबियाई देश को उपन्‍यास का विषय बनाया है और गिरमिटिया परंपरा में सूरीनाम की धरती पर आए मेहनतकश पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों यानी भारतवंशियों की संघर्षगाथा को शब्‍द दिए हैं । यह उन लोगों की कहानी है जो अपनी जड़ों से कटे हैं, जिन्‍होंने पराए देश में अपनी संस्‍कृति, अपने धर्म और विश्‍वास के बीज बोए और पराई धरती को खून-पसीने से सींच कर पल्‍लवित किया । सूरीनाम पर इससे पहले डच भाषा में उपन्‍यास लिखे गए पर वे प्राय: नीग्रो समाज के संघर्ष को उजागर करते हैं । सरनामी भाषा में भी कुछ उपन्‍यास लिखे गए पर वे सर्वथा डच सांस्‍कृतिक आंखों से देखे गए वृत्तांत हैं । यह उपन्‍यास एक तरफ हिंदुस्‍तानी संस्‍कृति के दोगले चेहरों की असलियत अनावृत करता है तो दूसरी तरफ एक सौ साठ बरस के अंतराल में यहां पनपी सूरीनाम हिंदुस्‍तानी संस्‍कृति को भी उद्‍घाटित करता है । अतीत में जब पाल वाले जहाजों से हिंदुस्‍तानी यहां लाए गए थे तो उन पर गोरे डच कोड़े बरसाते थे, आज यहां उन्‍हीं हिंदुस्‍तानियों की आबादी 42 प्रतिशत है । सब कुछ छोड़ कर आए भारतवंशियों का अब हिंदुस्‍तान से संपर्क लगभग कट गया है । वे लौटना भी चाहें तो असंभव है । सूरीनाम की भारतवंशी संस्‍कृति और सरनामी हिंदी से सुपरिचित, भारतवंशियों के रहन-सहन, जीविका, पारिवारिक संबंधों को गहरे जीने एवं महसूस करने वाली पुष्‍पिता अवस्‍थी ने न केवल सूरीनाम के भौगोलिक परिवेश, जन-जीवन और पर्यावरण को पूरी समझ के साथ उकेरा है बल्‍कि भारतवंशियों के हालात और नीग्रो की लुटेरी प्रवृत्तियों तक को भी बहुत गहराई से विश्‍लेषित किया है ।
मुख्‍य किरदार ललिता सूरीनाम में पार्टी में देर रात अकेले होने और बारिश के जबर्दस्‍त आसार को देखते हुए घर पहुंचने की विकलता और सूरीनाम के लुटेरे परिवेश को देखते हुए भय से ग्रस्‍त है । ललिता का घर दूर है लेकिन उसे वहीं रहने वाला रोहित जो एक व्‍यवसायी है, चुटकियों में भयमुक्‍त कर देता है । कार में लिफ्ट देने के साथ ही अपनी सज्जनता का परिचय देने वाले रोहित के प्रति धीरे-धीरे ललिता में लगाव पैदा होता है । इस बीच वह एक ऑपरेशन के लिए अस्‍पताल में दाखिल होती है । इस दौरान रोहित न सिर्फ देखभाल करता है बल्कि उसे अस्पताल से अपने घर ले आता है । रोहित मूलत: भारतवंशियों की संतान है जो कभी दो-तीन पीढ़ियों पहले सूरीनाम आए थे और अब उनका हालैंड में कारोबार है । दो दिल कैसे उत्तरोत्तर एक होते जाते हैं, परिस्‍थितियां कैसे खूबसूरती से इसे संभव करती हैं, यह लेखिका ने बताया है ।
कालांतर में, रोहित का अपने पुरखों की याद को संरक्षित करने के लिए सूरीनाम में पुरखों की जमीन पर स्‍कूल और मंदिर आदि के निर्माण में लगना उसका और ललिता का साझा स्‍वप्‍न बन जाता है । इसी बहाने ललिता सूरीनामी जीवन, भारतवंशियों की सांस्‍कृतिक परंपराओं, पारस्‍परिक रिश्‍तों, संबंधों में आते हुए पश्‍चिमी आधुनिकता के प्रभावों तथा अपने को न बदलने की एक जिद्दी धुन लिए सूरीनामी भारतवंशियों को अपने विवेक और अध्‍ययन में गहरे पोसती है । ऊंची तालीम और कारोबार के लिए सूरीनामियों की पहली पसंदीदा जगह हालैंड है । इसलिए हालैंड के डच और भारतीय समाज पर भी तमाम टिप्‍पणियां यहां संवादों और किस्‍सागोई में समेटी गई हैं । हालैंड के भारतीय और डच भाषी समाज में सेक्‍स और यौनिकता के प्रति खुलेपन को भी बेबाकी से चित्रित किया गया है । जहां बिना विवाह किए रहने की छूट है तथा समाज में मर्दवादी दृष्‍टि का बोलबाला है । 
किस्‍सागोई का केंद्र यों तो सूरीनाम और हालैंड ही है पर इसके नैरेटिव में कैरेबियाई देशों के हवाले भी आए हैं । जैसे लेखिका कहती है, ‘‘सूरीनाम की धरती ही नहीं, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना, वेनेजुएला, पेरु, चिली और ब्राजील आदि के जंगल या यूं कहें पूरे दक्षिण अमेरिका के जंगलों को देखकर ऐसा लगता है कि पृथ्वी का यह हिस्सा आज भी कुंआरी कन्या की तरह है । जंगल आज भी मौलिक रूप में जीवित हैं जिसे भोगवादी आंखों ने अभी तक स्पर्श नहीं किया है । यूं मानो इसे अभी सिगरेट की तरह सुलगाकर पिया नहीं है ।’’ इस तरह यह उपन्‍यास केवल ललिता और रोहित के प्रेम और दाम्‍पत्‍य की दास्‍तान ही नहीं, नीदरलैंड और सूरीनामी समाज, संस्‍कृति और भारतवंशियों के प्रति सूरीनामी प्रशासन के रवैए का भी संजीदा आख्‍यान बन गया है जिसे पुष्‍पिता अवस्‍थी ने अपने प्रवासी भारतीय मन-मिजाज के अनुरूप भाषायी आकर्षणों के साथ लिखा है । वृत्तांतों में रिपोर्ताज की महक है पर किस्‍सागोई आहत नहीं होती ।
(वरिष्ठ समालोचक ओम निश्चल की यह समीक्षा 'आउट लुक' पत्रिका में प्रकाशित हुई है ।)

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

।। अनंग पुष्प ।।















तुम
प्रेम का शब्द हो
विदेह प्रणय की
सुकोमल देह
अनंग पुष्प की
साकार सुगंध

मेरी अनुभूति का
आलिंगी अभिव्यक्त रूप
कि अधर
धरते ही तुम्हारे
ओंठ के भीतर
फूटता है
अजस्र अमृत कुंड
जिसमें रह रह कर
तपती हूँ
अपनी ही
ज्वालामुखी की आँच में
लावा के सुख को
जानने के लिए

अपनी सी साँसों की
हिमानी हवाओं में
बर्फ होती देह
तुम्हारी स्मृतियों के स्वप्न से
पिघलती है

अपनी ही प्यास को
बुझाने के लिए
पीती हूँ अपनी ही
देह का पिघलाव
नयन-कुंड में
जो सुरक्षित है
विरह-जल का पर्याय बनकर
आँसू होकर
तुम्हारे सामने न होने पर
दर्द से जनमे
आँसुओं को
दर्द से जिया है

प्रतीक्षा की आग के ताप को
आँसू    चुप नदी की तरह
पीते हैं

अपने कोशिश भरे बहाव में
इंतजार की टूटी लकीरें
तोड़ती हैं     संवेदनाओं की हिम्मत

प्रतीक्षा के
शाब्दिक पुल
समय के अंतराल पर
असमर्थ हैं

दर्द से जनमे आँसू
बनाते हैं   आँसुओं के दर्द का पुल
समय को लाँघने के लिए

प्रतीक्षा से थके चेहरे की
उदास सिलवटों और
तनहाई की चिमड़ी झुर्रियों को
मिटाते हैं आँसू
तुम्हारे हाथ, ओंठ और वक्ष की याद में
शायद,
चेहरे के आँसू खींच लाए तुम्हें
जैसे समय
खींच लाता है सूर्य ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

बुधवार, 30 अगस्त 2017

।। देह की चाक से ।।
















सब कुछ
साँस ले रहा है
मेरी देह में
संपूर्ण सृष्टि
तुम्हारी प्रकृति बनकर
एक अंश में
धड़क रही है
मेरे भीतर

अधरों में अधर
आँखों में आँखें
साँसों में साँसें
हथेली में स्पर्श
हृदय में साँस
ले रही है तुम्हारी ध्वनि
अनहद नाद की तरह

अपने सर्वांग में
मैं जीती हूँ   तुम्हारा सर्वस्व
तुम्हारे शिवत्व को
साध रही हूँ   अपनी शक्ति में
तुम्हारा अंतस और बाह्य
गढ़ रही हूँ
अपनी देह की चाक में
कुम्हारिन की तरह

तुममें
खुद को खोकर ही जाना है
प्रेम में जीना
और अर्धनारीश्वर
हो जाना
लेकिन
सर्वस्व विसर्जन की
समर्पिणी साधना के बाद

देह के ब्रह्मांड में
नव नक्षत्र की तरह
अपनी धड़कनों में
चमक रहा है
तुम्हारा प्रणय
देह की कांति बनकर

स्फूर्ति रच रही है
मेरे ही भीतर प्रेम
प्रेम का स्थायी सुखोत्सव

गर्भ की आँख में
लगाया था तुमने काजल
लाल आँसू बन कर
रिस गया वह

गहराई से जिए गए
सघन संबंधों को
भरा था गहरे अर्थ से
कि इससे पहले
जैसे यह शब्द
अर्थ के बिना था

अनुभूति की
दुग्ध नलिकाओं से
उतरने लगा था दूध
गर्भस्थ शिशु के लिए
हृदय की कोख में
धड़कने लगा था
'माँ' शब्द
अपनी ही साँसों में
महसूस होने लगी थी
अपने बच्चे की दुधीली साँस
और ममता की सुगंध
हथेलियाँ
वात्सल्य से
मुलायम और गदीली होने लगी थीं

अपनी पुलक में
महसूस करने लगी थी
तुम्हारे शिशु की किलक

मेरे सपनों में
शामिल होने लगा था
उसका भविष्य

धीरे-धीरे देह टोहने लगी थी
तुम्हारे प्यार का जादु
जैसे मैंने जिया है
तुम्हारा जादुई प्रेम
अपने हिमालय से
गुप्त गोदावरी तक

अपने केशों में
महसूस होने लगी थी
उसकी भिंची मुट्ठियाँ
और उनका खिंचाव
अपने कंधों पर
शैशव का सोंधापन
अपने स्तनों में
उसकी भूख का भारीपन
और छाती में
दुधारू गायों का-सा भार
उसकी काल्पनिक स्मृतियों की लार से
भीजने लगी थी    देह

नानी की लोरी
तरंग बन जाग उठी थी
भूले हुए कंठ में
हथेलियाँ, सीखने लगी थीं
थपकियों का कत्थक
शिशु को
अपने सपनों की छाती से
लगाकर सुलाने के लिए
जैसे      तुम्हारे वक्ष से लगकर
हृदय ने सीखा है
तुममें समाकर जीना

तुम्हारे शिशु में
मैं देखने लगी थी    अपना सूर्योदय
दैवी शक्ति का आविर्भाव
मेरे भीतर
झरने लगी थी
पराग की माटी
जिससे लीपने लगी थी
अपने मन की देहरी
कि अचानक
अपने ही भीतर
झर गया
हमारी देह का केशर
सपने की आँख
खुलने से पहले ही
खून से लाल हो गई
नव जीवन की मृत्यु का दुःख
मौत से बड़ा दुःख है

अपनी मौत से
अधिक भयानक है
अपने ही देह-घर में
गर्भस्थ शिशु की मौत
'माँ' ही जान पाती है
देह का वसंत ऋतु में
बदल जाना
और पतझर का पर्याय
बन फड़फड़ाना

देह का
बसंत घर से मौत घर में
बदल जाने का दुःख
गौतम बुद्ध के दुःख दर्शन से परे है
जब औरत जीती है
अपनी ही देह में
नव अंकुरित देह के झर जाने का त्रास
कि जैसे कोट का बटन
लगाने से पहले
छूट गया हो हाथ से
जैसे गम में लिखे
नई इबारत कि
इससे पहले
चू पड़े स्याही
देह से बाहर
जैसे      देह ब्रह्मांड से
एक नक्षत्र
टूटकर
गिर गया हो
ब्रह्मांड से बाहर
जैसे कलाई से
धड़कती घड़ी
उतार ली हो समय ने
जबकि हर पल
डरती रहती थी
गर्भपात से पहले
कोमल और मुलायम
ईश्वर घर की तरह पवित्र
स्वर्ग से सुंदर
पाँखुरी से मुलायम
पराग से सुगंधित
देह-गर्भ-गृह से बाहर आने पर
वैसी ही भीषण दुनिया में रहेगी
उसकी बेटी
जैसी दुनिया में
सूरज के होने पर भी
काँपकर रखती है अपने पाँव
हर दिन

घर से बाहर
और ठीक से चलती है साँस
घर पहुँचने पर ही
जबकि रात में
दिन की हदस से
कई बार
भर आती थीं आँखें
रात के काले अँधेरे में भी
कि दिवस की दुर्घटनाओं की
याद से भरकर
कि सूर्य के
सिर पर
होने पर भी
दिमाग का अँधेरा
जल्लाद बनने से
नहीं बच पाता है

सपनों के पाँव के मौजे का
पहला फंदा डालते ही
देह की सलाई से
ढुलक गया
नव-देह का
सुकोमल
प्यार का फंदा ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

।। आँसू छुपाकर ।।
















आँसू छुपाकर
रोती हैं     आँखें
जैसे
नजरें बचाकर
मिलती हैं     नजरें

ओंठ सहेज रखते हैं
स्पर्श का कोमल सुख
जैसे
शब्दों में शेष है
नाजुक अर्थ-छुअन

यादें,
याद करती हैं
यादों की सुगंध

मन के
कहीं कोना भर मटियाली जगह पर
उग आता है    प्रिय के ओंठों से लगाया
प्यार का पेड़
कि पूरी देह
'कल्पवृक्ष' से भी
जादुई हो जाती है

जिस पर
उकेरा जा सके
तुम्हारा नाम
क्योंकि तुम
अनोखे प्रणय के आविष्कर्ता हो

तुम्हारी आँखों के मिलान
और ओंठों के स्पर्श से
जन्म लेते हैं    नए शब्द
अपने अद् भुत नयनालिंगन में
रचते हैं
बिना छुए
छुअन की अनबोली
मीठी भाषा
जिसका स्वाद
पूरी देह में घुलकर
रचता है मिठास का आनंद
स्वाद से परे जाकर ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

सोमवार, 28 अगस्त 2017

।। रेत की नदी ।।























उदास मन की जड़ें 
रेत की नदी में हैं
प्यासी और प्यासी

तुम्हारे सुख के अलावा
कोई खुशी नहीं हँसा पाती है   उदासी को
अपनी ही आँखें नहीं सोख पाती हैं
आँसुओं के चिह्न

किसी ईश्वरीय-मौन में
नहाकर उदासी
धो लेना चाहती है
अपना करुण चेहरा

तुम्हारी अनुपस्थिति में
चुपचाप
कहाँ से उग आते हैं
नागफनी के काँटे
चेहरे में
शब्दों में
साँसों में

प्रणय
उतार फेंको    उदासी का
समुद्री मछुआरी जाल
जिसमें
भगवान के प्यार के आनंद की
चमक भी घुटन में दब जाती है ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

रविवार, 27 अगस्त 2017

।। रक्त-बूँद ।।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
हर पल के पार
जाने के लिए
खून का बूँद-बूँद
देती हूँ
और परे होती हूँ समय के
तुम्हारे पास पहुँचने के लिए

तुम्हारी हथेलियों में है
मेरी जिंदगी
जिसे ओठों से पीकर
ही जी पाती हूँ

तुम्हारी हथेली
एक वृक्ष की तरह
मेरी हथेली में खिल रही है
तुम्हारी मुस्कुराहट की तरह
जिसे देखने के लिए ही
ऑंखें खुलती हैं
वरना
आँखों के घर में
मैं तुम्हारे साथ हूँ
तुमसे दूर हो कर भी

बूँद-बूँद
खून देकर
जी पाती हूँ
अपनी अस्मिता की 
जिद की लड़ाई

नवरात्र की साधना में
तुम हो मेरी सिद्धि
मेरे सारे सपने
तुम्हारी आँखों में
पलते हैं
जिसकी उजली कोमलता
मैं
चूम कर महसूस करती हूँ

तुम्हारी जिंदगी की तारीखें
मेरी जिंदगी की डायरी के
पन्ने हैं
जिनमें मैं तुम्हारा नाम लिखकर
तुममें तुम्हारे सपने भरती हूँ ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

सोमवार, 21 अगस्त 2017

।। दर्पण ।।


















तुम्हारी अनुपस्थिति में
घर का दर्पण रहता है उदास
मेरी तरह     सूनेपन से संपूर्ण

घबराए हुए स्वप्न
देखते हैं    अपना चेहरा
समय छोड़ जाता है
अपने कुछ प्रश्नचिह्न

परछाईं में
उतर आए हो तुम
स्मृतियों से छनकर
मोहक तसवीर में

आँखों के करघे पर
अदृश्य आँखें बुनती हैं
अलौकिक स्मृति पट्ट
स्मृति अधर लिखते हैं
अदृश्य हृदय भाष्य

स्वप्न खोजते हैं स्मृतियाँ
स्मृतियाँ देखती हैं      नवस्वप्न
अपने अकेलेपन में

तुम्हारी अनुपस्थिति में
स्मृतियाँ रचती हैं
उपस्थिति का सौंदर्यशास्त्र
स्वप्न चुपचाप रचते हैं
तुम्हारी अनुपस्थिति उपस्थिति का
अनुपम आत्मीय लास्य

चाँद की चाँदनी की तरह
देह की काँच के भीतर
पसर जाता है तुम्हारा धवल प्रेम
चाँद की
विलक्षण नरमाहट
अनपेक्षित दक्षतापूर्वक
पहुँचती है    पृथ्वी तक
मन के खेतों के बीच
शब्दों की पगडंडियाँ
दूर तलक उनका भविष्य
बाँचती हुई दौड़ जाती है मनतलक

तुम्हारी नसों के रक्त से
अपनी छवि को
छूती हूँ     अपने रक्त में

तुम्हारी छवि में
पूरा विश्व उग आता है     मुझमें
विश्व में तुम्हें
और तुममें देखती हूँ    विश्व

तुम्हारी चुप में
मैं सुनती हूँ
अपने प्यार का सच
आँखें सुनती हैं
प्रेम की आत्मा को
जताने के लिए
अहर्निश । 

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

।। प्रतीक्षा के स्वप्न बीज ।।
















प्रतीक्षा में
बोए हैं  स्वप्न बीज
उड़ते समेल के फाहों को
मुट्ठी में समेटा है
विरोधी हवाओं के बीच

प्रतीक्षा में
मन के आँसुओं ने धोई है
मन की चौखट
और आँखों ने प्राणवायु से
सुखाई है जमीन

अधरों ने
शब्दों से बनाई है   अल्पना
और धड़कनों ने
प्रतीक्षा की लय में
गाए हैं     बिलकुल नए गीत

प्रतीक्षा में
होती हैं    आहटें
पाँवों की परछाईं
हथेलियों की गुहारती पुकार
आँखों के आले में
प्रिय के आने का उजाला समाने लगता है
और एक सूर्य-लोक
खिल उठता है

प्रतीक्षा के सन्नाटे में
कौंधती है
आगमन अनुगूँज
और शून्यता में
तिर आती हैं
पिघली हुईं
तरल आत्मीयता की लहरें
कि समाने लगता है
अपने भीतर
स्मृतियों की परछाईं का
अमिट संसार
आँखों में
साँसों में
पसीज आई हथेली में

आँखों की पृथ्वी पर
होती हैं     तुम्हारी मन ऋतुएँ
नक्षत्र से निरखते हैं
तुम्हारे नयन निष्पलक

चुपचाप परखती हैं     आँखें
अलौकिक प्रभालोक
तुम्हारे प्रणय का
अक्षय आकाँक्षा वलय ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

बुधवार, 16 अगस्त 2017

।। वियोग सुख ।।

तुमसे
छुपाकर जीती हूँ
तुम्हारा वियोग

आवाज में ही
दबा ले जाती हूँ रुलाई
लिखने से पहले
शब्दों से खींच लेती हूँ
बिछोह की पीड़ा

तुम तक
पहुँचने वाले
सूर्य और चंद्र में
चमकने देती हूँ
चूमा हुआ प्रेम

बिछोह के दर्द को
घोलती हूँ
रक्त भीतर
कि आँख में
जन्म न लें आँसू

ओठों की तड़प को
अपनी ही
उँगलियों से
मसलती रहती हूँ
बेबसी के दारुण क्षणों में
फिर भी
ओंठ सिसकते ही रहते हैं
साँस की तरह
अपने प्रेम के बिछोह में

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

।। धुन ।।
















घर में तुम
घर की तरह बचे हो
मुझमें      मेरी तरह

तुम्हारे जाते हुए
पाँवों को
नहीं रोक सके
आँख के आँसू
पर, तुम्हारी परछाईं
बनी है मुझसे
तुम्हारे साथ
तुम्हारी खामोशी में
समाया है      मेरा मौन
जैसे    तुम्हारे शब्दों में
मेरे शब्द
तुम्हारी आवाज में
मेरी धुन

तुम्हारे जूतों को
तुम्हारे पाँव के बिना
रहने की आदत नहीं
पर पाँव भीतर
होने पर भी
उनका 'जी' नहीं भरता है
तुम्हारी प्रतीक्षा में
सिकुड़ रहे हैं
हमकदम होने के लिए

तुम्हारी कंघी को
फिरा लेती हूँ अपने केशों में
तुम्हारी सहलाती
उँगलियाँ हैं       वे

तुमसे उतरे हुए कपड़े
रहते हैं मेरे सिरहाने
तुम्हारी अनुपस्थिति को
भरती हूँ तुम्हारी सुगंध के वक्ष से
जिस पर मेरा सिर
महसूसता है तुम्हें
और सुगंध से
मिलता है रास्ता
तुम तक पहुँचने के लिए
घनेरी रात में

तुम्हारी छोड़ी हुई
हर चीज को
छूती हूँ
कि जैसे अपने
स्पर्श में से
बचे हो तुम
हर वस्तु में
कि
तुम्हारे देखे गए
आईने में आदमकद
देखती हूँ खुद को
अहल्या की तरह
पुनर्प्राणार्जित
मेरी साँसों में
चलती है तुम्हारी साँस
जैसे     तुम्हारे जीवन में
मेरा जीवन ।
 
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

।। देह-विदेह ।।
















दो गोलार्द्धों में
बाँट दिए जाने के बावजूद
पृथ्वी
भीतर से कभी
दो ध्रुव नहीं होती
मेरी तुम्हारी तरह

तुम्हारी साँसें
हवा बनकर
हिस्सा होती हैं
मेरे बाहर और भीतर की प्रकृति
तुमसे सृष्टि बनती है ।

तुम्हारा होना
मेरे लिए रोशनी है ।
तुम्हारा वक्ष
धरती बनकर है
मेरे पास

तुम्हारे होने से
पूरी पृथ्वी मेरी अपनी है
घर की तरह
चिड़ियों की चहक में
तुम्हारे ही शब्द हैं
मेरी मुक्ति के लिए

मुक्ति के बिना
शब्द भी गले नहीं मिलते हैं
मुक्ति के बिना
सपने भी आँखों के घर में
नहीं बसते हैं ।

मुक्ति के बिना
प्रकृति का राग भी
चेतना का संगीत नहीं बनता है ।
मुक्ति के बिना
आत्मा नहीं समझ पाती है
प्रेम की भाषा

मुक्ति के बिना
सब कुछ देह तक सीमित रहता है
मुक्ति में ही होती है देह   विदेह ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

बुधवार, 9 अगस्त 2017

।। एकांत रातें ।।

समय की
हवाओं की धार
उतारती हैं उँगलियों से नाखून
और याद आती है
तुम्हारी हथेली की पृथ्वी
जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी
अपनी मुट्ठी की मंजूषा में
सहेज रखना चाहती थी

तुम्हारी हथेली की
अनुपस्थिति में
पृथ्वी छोटी लगती है
बहुत छोटी
जहाँ मेरे टूटे नाखून को
रखने की जगह नहीं है
न ओठों के शब्द
और न आँखों का प्यार

जिन हथेलियों में
सकेल लिया करती थी
भरा-पूरा दिन
एकांत रातें
बची हैं   उनमें
करुण बेचैनी
सपनों की सिहरनें
समुद्री मन की सरहदों का शोर

तुम्हारी आँखों में सोकर
आँखें देखती थीं
भविष्य के उन्मादक स्वप्न
तुम्हारे वक्ष में सिमटकर
अपने लिए सुनी है
समय की धड़कनें
जो हैं
सपनों की मृत्यु के विरुद्ध ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

।। अनोखे शब्द ।।

समुद्र-पार की उड़ान से पहुँचा है
भारी हैं     उसके पंख
अलौकिक है     प्रेम
जो समर्पित होता है
समुद्री दूरी के बावजूद
प्रतीक्षित और विरल
जीवन-स्पर्श के लिए

तुम्हारे-अपने संबंधों के लिए
रची है मैंने
एक अनूठी भाषा
जिसके शब्द
रातों की तनहाई
और नींदों के सपनों से बने हैं

खुली आँखों में
सपनों का घर है
आँखों के पाँव
पहचानते हैं हृदय का रास्ता
काँच हुई देह पर
गिरते हैं     ओठों के बूँद-शब्द

पिघलता है     रंगों का सौंदर्य
अकेलेपन की आग में
स्मृतियों की गीली रेत पर
चलती हैं      अधीर आकांक्षाएँ

अभिलाषाएँ
वेनेजुएला के राष्ट्रीय पुष्प-वृक्ष
'ग्रीन हार्ट' का पर्याय नहीं है
जो सिर्फ एक दिन के लिए
हवाओं में खिलता है
अपनी साँसों में
और जीता है जीवन सौंदर्य-बोध के लिए

तुम्हारा     अपना प्रेम
अलौकिक प्रणय-नदी का
लौकिक तट
तटबंध हैं         मैं और तुम

पूर्णिमा का सौंदर्यबोधी चाँद
मन भीतर पिघलकर
रुपहला समुद्र बनकर
समा जाता है
आँखों की पृथ्वी में
अपनी जगह बनाते हुए
महासागर की तरह

चमक चाँदनी के रुपहले डोरों से
मन बुनता है      सारी रात
अपने लिए        सुहाग-चूनर
तुम्हारे लिए        सुहाग-साफा

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

शनिवार, 29 जुलाई 2017

।। प्राणाग्नि ।।

अशोक वृक्ष की तरह
आवक्ष लिया है     तुमने
साँसों ने लिखी है
अछोर प्रणय की गुप्त-लिपि
जो तुम्हारे मन की जड़ों तक
पहुँचती है
तितिक्षा से मिलने के लिए

मेरे-तुम्हारे
प्रणय की साक्षी है    प्राणाग्नि
अधरों ने पलाश-पुष्प बन
तिलक किया है    प्रणय भाल पर
मन-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगंधित है
साँसों ने पढ़े हैं     अभिमंत्रित
सिद्ध आदिमंत्र

एक-दूसरे के देह कलश के
अमृत जल ने
पवित्र की है देह
जो प्राणवंत हुई है
भीग-भीग कर

सृष्टि की सुकोमल आर्द्र
पुष्प पाँखुरी अधर ने
अपने मौन स्पर्श से
लिखे हैं
अधरों पर
प्रणय के अघोषित शब्द
जिसे स्पर्श की आँखें
जानती हैं     पढ़ना

देह के हवन-कुंड में
पवित्र संकल्प के साथ दी है
अपने अपने प्राणों की चिरायु-शक्ति
प्रणय-शिशु के
चिरंजीवी होने के लिए
प्राण-प्रतिष्ठा की है साँसों की
देह-माटी में
तुमने रोया है
अपने प्रणय का प्रथम बीज

तुम्हारे अधरों ने लिखा है
मेरे अधरों पर
प्रथम प्रणय का संविधान
प्रेम का नया संयुक्तानुशासन
एकत्व और एकात्मकता के लिए

प्रेम का सिंदूरी-पक्षी
फूल-सा कोमल और मुलायम
सेमल-सा रेशमी
चित्त का चितेरा
प्रिय का हृदय-नीड़
उसे बचाओ
बुरे समय से
शब्दों के द्वारा

तुम्हारे शब्द
मन की स्वर्णिम गिन्नी है
हृदय के टकसाल में बनी
जिसमें एक ओर मेरी
और दूसरी ओर
तुम्हारी छवि है
प्रेम के
एक ही सिक्के हैं    हम दोनों
जिसकी
पहचान और धातु एक है ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

सोमवार, 24 जुलाई 2017

।। स्मृतियों का स्पर्श ।।

'अकेलापन' पतझर की तरह
उड़ता फड़फड़ाता है ।

तुम्हारी तस्वीर से
उतरता है स्मृतियों का स्पर्श
देह मुलायम होने लगती है
तुम्हारी चाहत की तरह

तुम्हारे शब्द
सपनों की आँख हैं 
जिससे रचती हूँ भविष्य  

तुम्हारी हथेलियों ने
मेरी हथेली में
छोड़ा है    भावी रेखाओं का छापा
जैसे मेरे हृदय ने
तुम्हारे हृदय ने
छोड़ा है     अपनेपन का विस्मरणीय स्मृति चित्र
कि तुम्हारे प्राणों में मैं
अपने पूर्ण को देखती हूँ

तुम्हारी साँसों से
लेना चाहती हूँ     साँसों की शक्ति
जिससे मेरे भीतर
तुम्हारे सपने जी सकें
वैसे ही       जैसे चाहत से
गर्भ में मुझसे साँस ले रहा है शिशु

तुम्हारे नाम को
लिख रहा है
मेरे गर्भ की दीवारों में
और रक्त में सान रहा है
तुम्हारे बीज का रस सुगंध
जो प्रणय का प्रथम प्राण बीज है
तुम्हारे नाम का
मेरी देह भूमि को
मातृभूमि में तब्दील करते हुए ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

।। सूखी गंगा ।।



















मेरे ओंठ में
सूख गई है     नदी
अकेलेपन की रेत की
नदी है     ओंठ
दो बूँद की प्यास में
देह को तपाते हुए

अँधेरे में बदल चुकी आँखों में
काले हो चुके हैं     सपने
दिन की कोई रोशनी
कठफोड़वा की तरह
देह के तने में
नहीं बना पाती    कोटर
भावी प्रकाश शिशु के प्रसव के लिए

दुनिया की
मांसाहारी दृष्टि से थक चुकी आँखें
तुम्हारी आँखों की गोद में
सिर रखकर
तुम्हारी देह की नदी में डूब कर
नहाते हुए विश्राम करना चाहती है
अगली सदी तक

तुम्हारी आँखों के साथ के रास्ते से
दौड़ने के लिए
पहुँचने के लिए
अपने हृदय की तरह
तुम बनाए रखना चाहते हो
मेरा मन तन और समय

लाल स्याही की तरह
तुम्हारे ओठों ने भरी है
मेरे मन के पृष्ठों की माँग
जो मेरे तुम्हारे
संबंधों का
दस्तावेज है     ऐतिहासिक

प्रणय-कथाओं से परे
नवीन प्रणय का
आधार पृष्ठ
ईश्वरीय कानून का
घोषित दस्तावेज
मेरे-तुम्हारे शब्द । 

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

सोमवार, 17 जुलाई 2017

पुष्पिता अवस्थी सम्मानित हुईं


भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने हाल ही में आयोजित हुए एक भव्य तथा गरिमापूर्ण समारोह में पुष्पिता अवस्थी को 'पद्मभूषण डॉक्टर मोतुरी सत्यनारायण अवॉर्ड' से सम्मानित किया । 1989 में स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2002 से हर वर्ष दिया जा रहा यह अवॉर्ड प्रतिष्ठित हिंदीसेवी सम्मान अवॉर्ड का एक हिस्सा है, जो दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को दिया जाता है । भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा समर्थित इस अवॉर्ड की दुनिया भर में प्रतिष्ठा 'ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पॉयर' जैसी है । कानपुर में जन्मी, बनारस में पढ़ने और पढ़ाने वाली और अब नीदरलैंड में 'हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन' के निदेशक के रूप में हिंदी के पठन-पाठन की जिम्मेदारी निभा रहीं बहुमुखी प्रतिभा की धनी पुष्पिता अवस्थी को सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने प्रशंसा पत्र, शॉल और पाँच लाख रुपए उन्हें सौंपे । 

शनिवार, 11 मार्च 2017

।। अपनापन ।।

तुम्हारी मुट्ठी में है
मेरी हथेलियाँ
बर्लिन शहर के बीच
ढही हुई दीवार के बाद जैसे

साँझ की निलाई के साथ
आँखों में समाता है
तुम्हारा चेहरा
द्धितीय विश्वयुद्ध बाद बसे हुए
बर्लिन शहर की मुस्कुराहट की तरह

मुझे चूमते हुए
तुम्हारे अधर
जैसे      सोखते हैं
इतिहास और शब्दकोष से
अर्थ की गहरी जड़ें
जो सोयी हुई हैं
विश्व युद्धों के इतिहास में
ऋग्वेद की ऋचाओं में
उपनिषद, पुराण और जातक कथाओं के
अर्थ-सूत्रों में

तुम्हारी मुट्ठी
अक्सर छूट जाती है
मेरी हथेली में
विश्व के अनकहे
संकटों को कहने के लिए

जिन्हें गहरी रात गए
आँखें पढ़ती हैं
अपनी ही हथेली
जिसमें तुम्हारी हथेली ने
रचा है       अनरचा इतिहास
तुम्हारी अनुपस्थिति को
रोपती हूँ       शब्दों में
तुम्हारे शब्द-बीजों से
उगाती हूँ कविता की फसल
प्रेम और आज के समय के लिए

जो मेरे खालीपन को
खलिहान में तब्दील कर सके

ईश्वर-प्रतिमा पर
चढ़ा हुआ पुष्प-हार
कभी आ जाता है
जैसे हथेलियों में
चरम सौभाग्य सुख की तरह
वैसे ही
तुम्हारी आँखें
सर्वस्व सौंपती हैं     अपना
निज प्रेम को

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

।। गदराई हुई नदी ।।
















तुम्हें
अवतरित करती हूँ
स्मृतियों की देह में
जहाँ से
प्रवेश करते हो तुम
सर्वाङ्ग में

सूर्य रश्मियाँ
चिड़ियों की तरह
गुनगुनाने लगती हैं      अनोखे शब्द
कहीं भीतर से भीतर तक

अनुभूति में
उतरने लगती है
उष्म तासीर
पूरी संजीदगी के साथ

भोर होने से पहले ही
महसूस होते हैं    अजोरे के
            'वे' कुछ शब्द
            तुम्हारी हथेली सरीखे
            अपने कंधे पर

जो अपने स्पर्श में
रचते हैं      विश्वास की भाषा
            पीठ पर
            नई इबारत
            निर्मल
            अलिखित ही

संवेदनाओं की पोरों से
कि अनुभव होते हो तुम
मुझमें ही उतरे हुए
जैसे       धूप
            बरखा
            ऋतुएँ और उनकी सुगंध
            अपनी तासीर के साथ

ऐसे में
स्मृतियों में
तुम्हारे प्रतिबिंब के
उझकते ही
मैं महानदी हो जाती हूँ     अमेज़न सरीखी
प्रवाहित होने लगता है      मुझमें जीवन
            तुम्हारी बाँहों के दोनों तटों बीच
            मैं उठने लगती हूँ
            अपनी देह की सतह से
            गदराई हुई नदी की तरह

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

दो कविताएँ

।। एकात्म अवस्था ।।

देह अंतरिक्ष के नक्षत्र हैं
नयन और अधर
सूर्य और चन्द

देह में देह का
लीन हो जाना
और फिर विलीन
विदेह प्रणय की
एकात्म अवस्था

।। स्मृति-भवन ।।

शब्दों से परे जाकर
रचे जाते हैं     शब्द
प्रेम में

संप्रेषण की सरस भाषा
प्रेम से परे जाकर रचती है
प्रेम

बह सकें जिसमें
बाधाओं के पाषाण-खंड
और बनाये 'घर'
जो मृत्यु के बाद भी
शेष रहे
स्मृति-भवन स्वरूप

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

तीन कविताएँ

।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।।

वह
पहनता है     मेरी आँखें
अपने चश्में की तरह

वह
धारण करता है     मेरा समय
अपनी घड़ी की तरह

वह
सुनता है        मेरे ही शब्द
अपनी आवाज में

वह
देखता है         अपने सपनों में
मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ
प्रेम में

।। सुंदरतम रहस्य ।।

ख़ुद को
छोड़ दिया है      मुझमें
जैसे      शब्दों में
छूट जाता है     इतिहास

सपनों की कोमलता
आकार लेने लगती है      सच्चाई में
अनुराग का रंग
उतरने लगता है      देह में
पलकों में लरजने लगते हैं
ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य

आँखें       ओंठों की तरह
मुस्कुराने लगती हैं
सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से

।। विश्वास के पर्याय ।।

बहुत चुपचाप
व्याकुल चित्त में
गूँथती है     शब्दों की परछाईं
साँसों में      सुगंध
धड़कनों में       आवाज़
सब पर्याय हैं       प्रेम में
स्पर्श के लिए

तृषा के क्षणों में
उसे सिर्फ़ 'प्रेम चाहिए'
जैसे       प्रकृति को वसंत

अपने सिरहाने
रखती है        प्रिय के शब्द
विश्वास के पर्याय

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

रविवार, 1 जनवरी 2017

दो कविताएँ























।। सौंपने के लिए ।।

मन के भोजपत्र पर
अदृश्य भाषा में
स्पर्श लिखता है
प्रणय का अमिट महाकाव्य
कि पूरी देह छूट जाती है
प्रिय-देह में
विदेह होने के लिए

पृथ्वी का विलक्षण प्रेम
उमड़ आता है
भीतर-ही-भीतर
तुम्हारे होने पर
कि सृष्टि का संपूर्ण अमूर्त सौंदर्य
मूर्त हो उठता है
हृदय की अँजुली में
तुम्हें सौंपने के लिए

।। नदी की गहराई ।।

अपनी
स्मृतियों में
तुम्हारे प्रतिबिम्ब के
उझकते ही
मैं
नदी हो जाती हूँ

प्रवाहित होने लगता है
मुझमें जीवन
तुम्हारी बाँहों के
दोनों तटों के बीच
मैं उठने लगती हूँ
अपनी देह की सतह से
नदी की गहराई की तरह

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)