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July, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। प्राणाग्नि ।।

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अशोक वृक्ष की तरह आवक्ष लिया है     तुमने साँसों ने लिखी है अछोर प्रणय की गुप्त-लिपि जो तुम्हारे मन की जड़ों तक पहुँचती है तितिक्षा से मिलने के लिए
मेरे-तुम्हारे प्रणय की साक्षी है    प्राणाग्नि अधरों ने पलाश-पुष्प बन तिलक किया है    प्रणय भाल पर मन-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगंधित है साँसों ने पढ़े हैं     अभिमंत्रित सिद्ध आदिमंत्र
एक-दूसरे के देह कलश के अमृत जल ने पवित्र की है देह जो प्राणवंत हुई है भीग-भीग कर
सृष्टि की सुकोमल आर्द्र
पुष्प पाँखुरी अधर ने अपने मौन स्पर्श से लिखे हैं अधरों पर प्रणय के अघोषित शब्द जिसे स्पर्श की आँखें जानती हैं     पढ़ना
देह के हवन-कुंड में पवित्र संकल्प के साथ दी है अपने अपने प्राणों की चिरायु-शक्ति प्रणय-शिशु के चिरंजीवी होने के लिए प्राण-प्रतिष्ठा की है साँसों की देह-माटी में तुमने रोया है अपने प्रणय का प्रथम बीज
तुम्हारे अधरों ने लिखा है मेरे अधरों पर प्रथम प्रणय का संविधान प्रेम का नया संयुक्तानुशासन एकत्व और एकात्मकता के लिए
प्रेम का सिंदूरी-पक्षी फूल-सा कोमल और मुलायम सेमल-सा रेशमी चित्त का चितेरा प्रिय का हृद…
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।। स्मृतियों का स्पर्श ।।
'अकेलापन' पतझर की तरह उड़ता फड़फड़ाता है ।
तुम्हारी तस्वीर से उतरता है स्मृतियों का स्पर्श देह मुलायम होने लगती है तुम्हारी चाहत की तरह
तुम्हारे शब्द सपनों की आँख हैं  जिससे रचती हूँ भविष्य  
तुम्हारी हथेलियों ने मेरी हथेली में
छोड़ा है    भावी रेखाओं का छापा जैसे मेरे हृदय ने तुम्हारे हृदय ने छोड़ा है     अपनेपन का विस्मरणीय स्मृति चित्र कि तुम्हारे प्राणों में मैं अपने पूर्ण को देखती हूँ
तुम्हारी साँसों से लेना चाहती हूँ     साँसों की शक्ति जिससे मेरे भीतर तुम्हारे सपने जी सकें वैसे ही       जैसे चाहत से गर्भ में मुझसे साँस ले रहा है शिशु
तुम्हारे नाम को लिख रहा है मेरे गर्भ की दीवारों में और रक्त में सान रहा है तुम्हारे बीज का रस सुगंध जो प्रणय का प्रथम प्राण बीज है तुम्हारे नाम का मेरी देह भूमि को मातृभूमि में तब्दील करते हुए ।
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। सूखी गंगा ।।

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मेरे ओंठ में सूख गई है     नदी अकेलेपन की रेत की नदी है     ओंठ दो बूँद की प्यास में देह को तपाते हुए
अँधेरे में बदल चुकी आँखों में काले हो चुके हैं     सपने दिन की कोई रोशनी कठफोड़वा की तरह देह के तने में नहीं बना पाती    कोटर भावी प्रकाश शिशु के प्रसव के लिए
दुनिया की मांसाहारी दृष्टि से थक चुकी आँखें तुम्हारी आँखों की गोद में सिर रखकर तुम्हारी देह की नदी में डूब कर नहाते हुए विश्राम करना चाहती है अगली सदी तक
तुम्हारी आँखों के साथ के रास्ते से दौड़ने के लिए पहुँचने के लिए अपने हृदय की तरह
तुम बनाए रखना चाहते हो मेरा मन तन और समय
लाल स्याही की तरह तुम्हारे ओठों ने भरी है मेरे मन के पृष्ठों की माँग जो मेरे तुम्हारे संबंधों का दस्तावेज है     ऐतिहासिक
प्रणय-कथाओं से परे नवीन प्रणय का आधार पृष्ठ ईश्वरीय कानून का घोषित दस्तावेज मेरे-तुम्हारे शब्द । 
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

पुष्पिता अवस्थी सम्मानित हुईं

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भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने हाल ही में आयोजित हुए एक भव्य तथा गरिमापूर्ण समारोह में पुष्पिता अवस्थी को 'पद्मभूषण डॉक्टर मोतुरी सत्यनारायण अवॉर्ड' से सम्मानित किया । 1989 में स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2002 से हर वर्ष दिया जा रहा यह अवॉर्ड प्रतिष्ठित हिंदीसेवी सम्मान अवॉर्ड का एक हिस्सा है, जो दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को दिया जाता है । भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा समर्थित इस अवॉर्ड की दुनिया भर में प्रतिष्ठा 'ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पॉयर' जैसी है । कानपुर में जन्मी, बनारस में पढ़ने और पढ़ाने वाली और अब नीदरलैंड में 'हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन' के निदेशक के रूप में हिंदी के पठन-पाठन की जिम्मेदारी निभा रहीं बहुमुखी प्रतिभा की धनी पुष्पिता अवस्थी को सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने प्रशंसा पत्र, शॉल और पाँच लाख रुपए उन्हें सौंपे ।