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September, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। नेह-छाल ।।

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अपनी साँसों के स्कॉर्फ में
सहेजती हूँ     सुनहरे बसंत की पीली खुशबू तुम्हारी साँसों की रेत पर 'सनी डे' रचाने के लिए स्वर्णिम इबारत
'समय' पतझर की तरह उतरता है मेरी धड़कनों में गहरे जंगल में अँधेरे की तरह फँसा है      मेरा समय समय की शाखों में हवाओं की तरह उलझकर झटपटाती है मेरी साँस
घने जंगल में कुहरे के रंग में अटकी हैं उम्मीदें रात की स्याही से अपनी उँगलियाँ गीली कर धरती पर उतरे हुए सूरज की देह पर लिखती हूँ    तुम्हारा नाम
अपने समय के तने की छाल को छील कर उस पर तुम्हारी सहलाई हुई उँगलियों से भीगे अपने नाखूनों से कुरेद कर लिखा है तुम्हारा नाम जिसे मेरी आँखें पढ़ती हैं
साँसें चूमकर रचती हैं प्यार की नई अनश्वर भाषा हवाओं में सींजने के लिए जिससे पूरे विश्व के मानव की साँसों की भाषा बदल सके सिर्फ तुम्हारे नाम पर ।
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। आत्मीय उपासना ।।

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आँसू लिखित शब्दों में
होता है    ईश्वर ईश्वर के कंधों पर टिकाती हूँ अपनी आँखें और भूल जाती हूँ     आँसू जो तुम्हारी अनुपस्थिति की आँख से उतरा है मन-गंगोत्री की व्यथा में
तुमसे कहने की सारी बातें वियोग में घुल कर आँसू बन जाती हैं अपनी साधना में प्रसाद के रूप में मैं भगवान से तुम्हें और तुम्हारी खुशी माँगती हूँ
तुम मेरी आँख की आँख हो मैं तुम्हारी ही आँखों को अपनी दृष्टि बनाकर दुनिया देखती हूँ
ओठों ने तुम्हारा नाम पुकार कर अपनी धरती में तुम्हारे ओठों को घर बनाने की अनुमति दी है हथेली ने तुम्हारी हथेली को अपनी संपूर्ण पृथ्वी सौंप दी है
स्मृति में तुम्हारा रूप बसाकर ईश्वर की तरह पूजा की है
रागिनी में राग की तृषा पर तुम्हारे अनुराग की शक्ति दी है
अपनी देह की पृथ्वी मैंने तुम्हारे और तुम्हारी संतान के नाम कर दी है जहाँ वे तुम्हारा नाम लिखें सिर्फ मेरे सुख के लिए
तुम्हारे लिए भगीरथ की तरह अपने भीतर भागीरथ की तलाश की है
तुम तक पहुँच कर अपने प्रणय-गर्भ में तुम्हारे बीज से एक ईश्वर की रचना की है अर्धनारीश्वर की संतान ।
('रस गगन गुफा में अझर…

।। अक्षय-स्रोत ।।

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शब्द
तुम्हारी तरह देखते हैं    मुझे और मैं शब्दों को तुम्हारी तरह
ईश्वर के प्रेम की छाया है     तुम्हारी आत्मा पर ईश्वर अंश है तुम्हारा चित्त
तुम्हारे प्रेम में मैं 'प्रेम' का ईश्वर देखती हूँ
तुम्हें छूकर मैं प्रेम का ईश्वर छूती हूँ
तुम्हारे कारण पाषाण में बचा है   ईश्वर
शब्दों में तुमने रचा है     ईश्वर क्योंकि तुमने ही तुम्हारे अस्तित्व में रचा है ईश्वर
इसीलिए तुममें है ईश्वर का प्रेम ईश्वरीय प्रेम पवित्र पारदर्शी प्रणय नदी का उद् गम अक्षय स्रोत ।
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। शब्दों से खींचती हूँ साँस ।।

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विदेश के प्रवास में
अँधियारे के मीठे उजालेपन में चाँदनी, सितारों में जब चमक चुकी होती है चाँद सोता है जब तुम्हारे सपनों में अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती की सुनहरी रोशनी में कभी शब्द तपते हैं ताप में और कभी मैं शब्दों के साथ
अपने बाहर की ही नहीं भीतर की भी साँस रोककर शब्दों से खींचती हूँ साँस पसीने से तर-ब-तर मन की उमसती कसक को पसीजी हथेली में रखती हूँ शब्द बनाकर तुम्हारे लिए लिखे जानेवाले शब्द हों वे जैसे हृदय-मंजूषा में प्रेम की पीड़ा के बहुत एकांत में चुपचाप जन्म लेते हैं शब्द जैसे आधी रात को पहर बदलता है हवाओं की साँस ठहर जाती है क्षण भर को तब सितारे लिखते हैं      नई तारीख नया दिवस
सूरज हर सुबह छींटता है नई उत्सव रश्मियाँ जैसे वे भी शब्द-बीज हों अगले भविष्य के लिए ।
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। आकाशगंगा ।।

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तुम्हारे बिना
समय     नदी की तरह बहता है मुझमें मैं नहाती हूँ     डर की नदी में जहाँ डसता है अकेलेपन का पनीला     साँप कई बार
मन-माटी को बनाती हूँ     पथरीला जिसकी देह को अपने स्पर्श से तराशकर तुमने बनाया है    मोहक
सुख की तारीखों को दफन करता है    समय मन के कब्रिस्तान में कपोत-सी उड़ जाती हैं - साँसें तुम्हारे वक्ष में धड़कने के लिए तुम्हारी स्मृतियों की परछाईं में पकड़ती हूँ तुम्हें
अपने भीतर के मौन में जीती हूँ   तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम तुम्हारी चुप्पी में होता है तुम्हारा सलीकेदार अपनापन
अकेले के अंधेरेपन में तुम्हारा नाम     भगवान् ब्रह्मांड का एक अंग देह की आकाशगंगा में तैरकर आँखें पार उतर जाना चाहती हैं अपने ठहरे हुए समय के शिखर से पटकर तुम्हारी धड़कनों के साथ चलना चाहती हैं     मेरी साँसें
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। महामंत्रोच्चार ।।

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प्रतिदिन
सूर्योदय के साथ आदित्यस्त्रोत के महामंत्रोच्चार के बाद सूर्य से नमित-नयन प्रार्थना की दमकते प्रणय की जो प्राण शक्ति बने और आत्मा को दीप्तमान् करे अपने प्रकाश-लेप से
अपनी हर धड़कन में वर्तमान की सुबह में चीखी हूँ पक्षियों की चहचहाहट में प्रेम से अधिक अपने प्रिय की पुकार में
मेरी आत्मा प्रिय सहचर की खोज में हर साँस में रही है एकाकी यायावर उसका आत्मीय अकेलेपन में पहचान ले उसे और बगैर उसके कहे उसके हृदय की भाषा को सुन मौन निमंत्रण में बन जाए उसका उसकी देह से भी अधिक आत्मीय सहचर । ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। तरंग ।।

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जिंदगी शैंपेन की एक बूँद लेकिन, तुम्हारे होने पर अकेले में 'वह' जहर की एक बूँद है मौत के डर से भरी जिंदा देह में जिंदगी की मौत अपने भीतर एक 'मसान' तट को जन्म देना है ।
मेरी ऑंखें मछली की आँखों की तरह प्रूप-समुद्र तैरती तुम्हारी आँखों के नॉर्थ-सी में जहाँ से सूर्यास्ती-सिंदूर को अपनी आँखों की चुटकी में लेकर मेरे भाल पर भरा था तुमने संध्या के सूर्यास्ती अग्नि-कुंड की परिक्रमा की थी मेरी हथेली ने तुम्हारी हथेली की भावी भाग्य रेखा में पहनाई थी   सूर्य रश्मियों से लहरों में बनी तरंगित वरमाला नॉर्थ-सी को अपनी अँजुली में लेकर तुम्हारी साँसों ने कसम खाई थी आजन्म-समुद्र की तरह अपने प्यार से भर देने की तुम नॉर्थ-सी हो और मैं तुम्हारे भीतर समाई तुम्हारे मन की सामुद्री मछली जिसकी आँखों और मन की मौन की भाषा पहचानते हो तुम ।
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। अवगाहन के लिए ।।

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मैं सेमल के फूल-सी
अनुभूति की मुट्ठी में समेट लेना चाहती हूँ प्रणय का संपूर्ण सुख तुम्हारी हथेली थामकर
बेपनाह सूनी आँखों को रखना चाहती हूँ विश्वास के सुकोमल घर में
मैं प्रकृति का अनन्य सुख जानने के लिए तुम्हारे सम्मुख होती हूँ समर्पित देह से नहीं देह से रिसकर एक अनंत राग के अवगाहन के लिए
अपने भीतर के पराएपन से मुक्ति के लिए मैं तुम्हारे अपनेपन में समा जाना चाहती हूँ और समाती हूँ चुपचाप कभी तुम्हारे विश्वास की प्रणय घाटी में कभी तुम्हारे आत्मीय अधर के अमृतकुंड में
मेरे ही प्राण तुम्हारे प्राण बनकर धड़कते हैं अब मेरे वक्ष भीतर
तुम्हारी छवि छूती है मेरी मन-छाया तुम्हारी बेचैन साँसों की कसक रिस आती है प्रणय की रश्मि बनकर
स्वतंत्र साँस से आती है    बाँसुरी की धुन जो कृष्ण ने बजाई थी आत्मा के प्रणय-नाद के निनाद के लिए
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

सूरीनाम में रहने वाले प्रवासियों की संघर्ष की गाथा है 'छिन्नमूल'

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प्रवासी भारतीय लेखकों में पुष्पिता अवस्थी का नाम प्रतिष्‍ठा से लिया जाता है । पहली बार किसी प्रवासी भारतीय लेखिका ने सूरीनाम और कैरेबियाई देश को उपन्‍यास का विषय बनाया है और गिरमिटिया परंपरा में सूरीनाम की धरती पर आए मेहनतकश पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों यानी भारतवंशियों की संघर्षगाथा को शब्‍द दिए हैं । यह उन लोगों की कहानी है जो अपनी जड़ों से कटे हैं, जिन्‍होंने पराए देश में अपनी संस्‍कृति, अपने धर्म और विश्‍वास के बीज बोए और पराई धरती को खून-पसीने से सींच कर पल्‍लवित किया । सूरीनाम पर इससे पहले डच भाषा में उपन्‍यास लिखे गए पर वे प्राय: नीग्रो समाज के संघर्ष को उजागर करते हैं । सरनामी भाषा में भी कुछ उपन्‍यास लिखे गए पर वे सर्वथा डच सांस्‍कृतिक आंखों से देखे गए वृत्तांत हैं । यह उपन्‍यास एक तरफ हिंदुस्‍तानी संस्‍कृति के दोगले चेहरों की असलियत अनावृत करता है तो दूसरी तरफ एक सौ साठ बरस के अंतराल में यहां पनपी सूरीनाम हिंदुस्‍तानी संस्‍कृति को भी उद्‍घाटित करता है । अतीत में जब पाल वाले जहाजों से हिंदुस्‍तानी यहां लाए गए थे तो उन पर गोरे डच कोड़े बरसाते थे, आज यहां उन्‍ही…

।। अनंग पुष्प ।।

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तुम
प्रेम का शब्द हो विदेह प्रणय की सुकोमल देह अनंग पुष्प की साकार सुगंध
मेरी अनुभूति का आलिंगी अभिव्यक्त रूप कि अधर धरते ही तुम्हारे ओंठ के भीतर फूटता है अजस्र अमृत कुंड जिसमें रह रह कर तपती हूँ अपनी ही ज्वालामुखी की आँच में लावा के सुख को जानने के लिए
अपनी सी साँसों की हिमानी हवाओं में बर्फ होती देह तुम्हारी स्मृतियों के स्वप्न से पिघलती है
अपनी ही प्यास को बुझाने के लिए पीती हूँ अपनी ही देह का पिघलाव नयन-कुंड में जो सुरक्षित है विरह-जल का पर्याय बनकर आँसू होकर तुम्हारे सामने न होने पर दर्द से जनमे आँसुओं को दर्द से जिया है
प्रतीक्षा की आग के ताप को आँसू    चुप नदी की तरह पीते हैं
अपने कोशिश भरे बहाव में इंतजार की टूटी लकीरें तोड़ती हैं     संवेदनाओं की हिम्मत
प्रतीक्षा के शाब्दिक पुल समय के अंतराल पर असमर्थ हैं
दर्द से जनमे आँसू बनाते हैं   आँसुओं के दर्द का पुल समय को लाँघने के लिए
प्रतीक्षा से थके चेहरे की उदास सिलवटों और तनहाई की चिमड़ी झुर्रियों को मिटाते हैं आँसू तुम्हारे हाथ, ओंठ और वक्ष की याद में शायद, चेहरे के आँसू खींच ल…