शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

।। आकाशगंगा ।।
















तुम्हारे बिना
समय     नदी की तरह
बहता है मुझमें
मैं नहाती हूँ     डर की नदी में
जहाँ डसता है
अकेलेपन का पनीला     साँप
कई बार

मन-माटी को बनाती हूँ     पथरीला
जिसकी देह को
अपने स्पर्श से तराशकर
तुमने बनाया है    मोहक

सुख की तारीखों को
दफन करता है    समय
मन के कब्रिस्तान में
कपोत-सी
उड़ जाती हैं - साँसें
तुम्हारे वक्ष में धड़कने के लिए
तुम्हारी स्मृतियों की परछाईं में
पकड़ती हूँ तुम्हें

अपने भीतर के मौन में
जीती हूँ   तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम
तुम्हारी चुप्पी में होता है
तुम्हारा सलीकेदार अपनापन

अकेले के अंधेरेपन में
तुम्हारा नाम     भगवान्
ब्रह्मांड का एक अंग
देह की आकाशगंगा में
तैरकर आँखें
पार उतर जाना चाहती हैं
अपने ठहरे हुए समय के शिखर से
पटकर
तुम्हारी धड़कनों के साथ
चलना चाहती हैं     मेरी साँसें

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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