शनिवार, 23 सितंबर 2017

।। शब्दों से खींचती हूँ साँस ।।
















विदेश के प्रवास में
अँधियारे के मीठे उजालेपन में
चाँदनी, सितारों में
जब चमक चुकी होती है
चाँद सोता है
जब तुम्हारे सपनों में
अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती की
सुनहरी रोशनी में
कभी शब्द तपते हैं ताप में
और कभी मैं शब्दों के साथ

अपने बाहर की ही नहीं
भीतर की भी साँस रोककर शब्दों से खींचती हूँ साँस
पसीने से तर-ब-तर
मन की उमसती कसक को
पसीजी हथेली में रखती हूँ
शब्द बनाकर
तुम्हारे लिए लिखे जानेवाले
शब्द हों वे जैसे
हृदय-मंजूषा में
प्रेम की पीड़ा के बहुत एकांत में
चुपचाप जन्म लेते हैं शब्द
जैसे आधी रात को पहर बदलता है
हवाओं की साँस ठहर जाती है क्षण भर को
तब सितारे लिखते हैं      नई तारीख
नया दिवस

सूरज
हर सुबह
छींटता है नई उत्सव रश्मियाँ
जैसे वे भी
शब्द-बीज हों
अगले भविष्य के लिए ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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