बुधवार, 27 सितंबर 2017

।। आत्मीय उपासना ।।























आँसू लिखित शब्दों में
होता है    ईश्वर
ईश्वर के कंधों पर
टिकाती हूँ अपनी आँखें
और भूल जाती हूँ     आँसू
जो तुम्हारी
अनुपस्थिति की आँख से
उतरा है
मन-गंगोत्री की व्यथा में

तुमसे कहने की सारी बातें
वियोग में घुल कर
आँसू बन जाती हैं
अपनी साधना में
प्रसाद के रूप में
मैं भगवान से तुम्हें
और तुम्हारी खुशी माँगती हूँ

तुम
मेरी आँख की आँख हो
मैं तुम्हारी ही आँखों को
अपनी दृष्टि बनाकर
दुनिया देखती हूँ

ओठों ने
तुम्हारा नाम पुकार कर
अपनी धरती में
तुम्हारे ओठों को
घर बनाने की अनुमति दी है
हथेली ने
तुम्हारी हथेली को
अपनी संपूर्ण पृथ्वी सौंप दी है

स्मृति में
तुम्हारा रूप बसाकर
ईश्वर की तरह
पूजा की है

रागिनी में
राग की तृषा पर
तुम्हारे अनुराग की
शक्ति दी है

अपनी देह की पृथ्वी
मैंने तुम्हारे
और तुम्हारी संतान के
नाम कर दी है
जहाँ वे तुम्हारा नाम लिखें
सिर्फ मेरे सुख के लिए

तुम्हारे लिए
भगीरथ की तरह
अपने भीतर
भागीरथ की तलाश की है

तुम तक
पहुँच कर
अपने प्रणय-गर्भ में
तुम्हारे बीज से
एक ईश्वर की रचना की है
अर्धनारीश्वर की संतान ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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