गुरुवार, 28 सितंबर 2017

।। नेह-छाल ।।























अपनी साँसों के स्कॉर्फ में
सहेजती हूँ     सुनहरे बसंत की
पीली खुशबू
तुम्हारी साँसों की रेत पर
'सनी डे' रचाने के लिए
स्वर्णिम इबारत

'समय'
पतझर की तरह
उतरता है मेरी धड़कनों में
गहरे जंगल में
अँधेरे की तरह
फँसा है      मेरा समय
समय की शाखों में
हवाओं की तरह
उलझकर झटपटाती है मेरी साँस

घने जंगल में
कुहरे के रंग में
अटकी हैं उम्मीदें
रात की स्याही से
अपनी उँगलियाँ गीली कर
धरती पर
उतरे हुए
सूरज की देह पर
लिखती हूँ    तुम्हारा नाम

अपने समय के
तने की
छाल को छील कर
उस पर
तुम्हारी सहलाई हुई उँगलियों से भीगे
अपने नाखूनों से कुरेद कर
लिखा है तुम्हारा नाम
जिसे मेरी आँखें पढ़ती हैं

साँसें चूमकर
रचती हैं प्यार की नई
अनश्वर भाषा
हवाओं में सींजने के लिए
जिससे
पूरे विश्व के मानव की
साँसों की भाषा बदल सके
सिर्फ तुम्हारे नाम पर ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें