रविवार, 12 नवंबर 2017

।। पुनर्जन्म का सुख ।।
















वह मुझे सुनता है
अपने पहले प्यार की तरह

वह मुझसे खेलता है
बचपन की यादों की तरह

वह मुझे खिलाता है
अपने सुख का पहला कौर

वह मुझे देखता है
अपने भविष्य की तरह

वह मुझे सहेजता है
अपनी हथेलियों की तरह

वह मुझे चूमता है
अपने अनमोल सपने की तरह

वह मेरे मौन को पढ़ता है
सबसे सशक्त संवाद की तरह

वह मुझे रचता है
थकान उतार कर
अपने प्यार से

वह मुझे देता है पुनर्जन्म का सुख
अपनी संतान को जन्म देने से पहले
वह मुझमें प्यार जन्मता है

सारी स्तब्धताओं के बावजूद
मैं उस तरह नहीं चल रही
जैसे दुनिया दौड़ रही
क्योंकि
मैं जानती हूँ
जहाँ गति होती है
वहाँ गहराई नहीं होती

गति में सब कुछ
छूटता जाता है
आँखें भी नहीं
पकड़ पाती हैं ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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